आलीशान गाड़ियों के शोरूम हों या महंगे से महंगे सामानों से सजे मॉल खरीदारों की कमी नहीं है. जाहिर है खरीदारी वही करते हैं जिनके पास पैसा हो, जो कमाते हों लेकिन बात जब इस कमाई पर टैक्स देने की आती है तो जो आंकड़ा सामने आता है वो चौंकाने वाला है. 125 करोड़ लोगों के देश में 1 करोड़ या इससे ज्यादा की कमाई वाले सिर्फ 18,359 लोग हैं. वित्त मंत्रालय की तरफ से साल 2011-12 के आय़कर आंकड़ो में ये बात सामने आई है.
ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं क्योंकि दिल्ली के डीएलएफ इम्पोरियो में जहा सिर्फ लक्ज़री कपडे, जूते, घड़िया, और बैग मिलते हैं का साल 2011-12 का मुनाफा 61 करोड़ रुपये हैं और यही एक ऐसा मॉल नहीं है जहा मुनाफा होता है.
देश में करीब 18 हजार करोड़पति होने का आंकड़ा कितना सही है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसी साल यानी 2011-12 में लोगों ने किस किस तरह के खर्चे किए.
2011-12 में ऑडी, बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज़ और जैगुआर लैंड रोवर ने देश में 25,645 गाड़ियां बेचीं. इनकी गाड़ियों की औसत क़ीमत 40 लाख होती है. यानी 25,645 लोगों ने 40-40 लाख की गाड़ियां ख़रीद लीं लेकिन 1 करोड़ की कमाई मानी सिर्फ़ 18,359 ने. 2011-12 में अकेले मुंबई में 10 करोड़ से 100 करोड़ रुपये के 1880 फ़्लैट बिल्डरों ने बाज़ार में लॉन्च किये, लेकिन 1 करोड़ की कमाई बताने वाले सिर्फ़ 18,359 लोग थे.
जानकारों का मानना है कि भारत में टैक्स न देने या बचाने वालों की संख्या अच्छी खासी है. लोग अब भी बड़ी और महंगी खरीदारी के लिए कैश का इस्तेमाल करते हैं, इस वजह से भी करोड़पतियों की संख्या उतनी नहीं दिखती है जितनी होनी चाहिए.
2013 की कोटक महिंद्रा की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2011 में देश में 81,000 ऐसे परिवार थे जिनके पास 25 करोड़ रुपये से ज़्यादा थे. लेकिन सरकारी आंकड़े कह रहे हैं कि उस साल सिर्फ़ 18359 लोगों ने अपनी सालाना कमाई 1 करोड़ से ज़्यादा बताई. हालांकि इसका एक पक्ष ये भी है कि इस संख्या में कंपनियों के रिटर्न शामिल नहीं हैं.
मास्टरकार्ड ने भी 2012 में एक सर्वे किया था जिसके मुताबिक़ भारत में जो लोग लक्जरी सामान लेने की सोच रहे थे उनकी संख्या सिंगापुर के अलावा बाक़ी सभी एशियाई देशों के लोगों से ज़्यादा थी. फिर टैक्स में 1 करोड़ से ज़्यादा की कमाई बताने वाले सिर्फ़ 18359 कैसे हो सकते हैं.